जैसा मौसम, वैसा भोजन… कहता है आयुर्वेद, हर माह के हैं खास आहार, इसमें न करें भेद

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नई दिल्ली. एन पी न्यूज 24  – हमारा शरीर पंच महाभूतों (वायु, आकाश, अग्नि, जल और पृथ्वी) से बना है। इन्हीं पंचभूतों में बनते हैं कफ, पित्त और वात। ये शरीर में कम या ज्यादा हो सकते हैं। उसे दोष कहते हैं। कोई भी दोष किन्हीं 2 महाभूतों के मेल से बनता है जैसे कि जल और पृथ्वी से कफ, अग्नि और जल से पित्त एवं वायु और आकाश के मेल से वात बनता है। कफ शरीर के पोषण, पित्त मेटाबॉलिज़म और वात मूवमेंट के लिए जिम्मेदार होता है। हर किसी के शरीर में ये तीनों दोष होते हैं लेकिन कोई एक या दो दोष ज्यादा होते हैं और बाकी दो या तीसरा कम होता है। जो तत्व ज्यादा है, उसी के आधार पर माना जाता है कि उस शरीर की प्रवृत्ति कफ, पित्त या वायु प्रधान है। जब तीनों दोषों में बैलेंस रहता है तो व्यक्ति स्वस्थ रहता है लेकिन अगर कोई दोष बढ़ जाए तो बीमारी की वजह बन जाता है। अपने शरीर की प्रकृति के अनुसार आहार और आचार करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) बढ़ती है और बीमार पड़ने की आशंका कम हो जाती है। आयुर्वेद में खान-पान से जुड़े कुछ नियम बताए गए हैं। बदलते मौसम में हर तरह की सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है, क्योंकि खान-पान का सीधा संबंध हमारे शरीर से है। तो आइए, जानते हैं कि कौन सा महीना हमें क्या खाने का संकेत देता है-

बसन्त ऋतु (मध्य मार्च से मध्य मई)
इस मौसम में गुनगुने पानी से स्नान करना चाहिए। इस माह में पाचन क्रिया भी प्रभावित होती है। ऐसे में आपको पुराने अन्न व धान्य का सेवन करना चाहिए। दालों में मूंग, मसूर, अरहर और चना का सेवन करें। इस मौसम में ठंडी प्रकृति वाला भोजन न करें, जिससे कि सर्दी, जुकाम आदि रोग आपको परेशान न करें। ज्यादा घी व तला भोजन, मिठाइयां न खाएं। न ही दिन में सोना और रात में देर तक जागना चाहिए।

ग्रीष्म ऋतु (मध्य मई से मध्य जुलाई)
इस मौसम में पाचन क्रिया इतनी मजबूती से काम नहीं करती है इसलिए आपको गरिष्ठ भोजन नहीं करना चाहिए।   आप दही, लस्सी, सत्तू, नीबू पानी जैसी चीजों का इस्तेमाल करें।  जितने फल खा सकते हैं या फलों का जूस पी सकते हैं, उसे पिएं। फलों में मौसमी, अंगूर, अनार, तरबूज आदि रसीले फल व फलों का रस, नारियल पानी, गन्ने का रस, कैरी का पना, ठण्डाई, शिकंजी का सेवन करें। ज्या दा से ज्यादा पानी पीएं।

वर्षा ऋतु (मध्य जुलाई से मध्य सितंबर)
इस मौसम में शरीर का वात बढ़ जाता है इसलिए तीखे, नमकीन, तले-भुने खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। इससे आपकी पाचन क्रिया प्रभावित हो सकती है। जन में दूध, घी, शहद, जौ, गेंहू व साठी चावल खाएं। पेट का रोग न हो इसलिये सौंठ और नीबू खाएं। पानी को उबालकर पिएं। इस मौसम में शराब, मांस, मछली और दही का सेवन न करें।

शरद ऋतु (मध्य सितम्बर से मध्य नवम्बर)
इस मौसम में बेहद हल्का , मीठा और शीतल भोजन करना चाहिए क्यों कि यह पचने में बेहद आसान होता है। शरीर में पित्त न बने इसके लिये नीम, करेला, सहजन जैसी चीजों का सेवन करें। इस दौरान तुरई, लौकी, चौलाई आदि कसैले साग का सेवन लाभदायक होता है। दाल की बात करें, तो इस मौसम में छिलके वाली मूंग की दाल, त्रिफला, मुनक्का, खजूर, जामुन, परवल, आंवला, पपीता, अंजीर का सेवन करें।

हेमन्त ऋतु ( मध्य नवंबर से मध्य जनवरी)
इस मौसम में शारीरिक गतिविधि बेहद कम हो जाती है इसलिए ज्यादा खाने से बचना चाहिए। वहीं, आपको इन मौसम में ब्रेकफास्ट जरूर करना चाहिए। साथ ही घी, दूध आदि से युक्त, देर से पचने वाला भोजन करें। आप लड्डू, पाक, हलवा, आदि पौष्टिक आहार का सेवन जरूर करें, अगर आप नॉन वेज खाते हैं, तो मांस, मछली सहित गुनगुने पानी का सेवन करें।

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